वर्ष 2011 की भाषायी जनगणना और गैर अनुसूचित मातृभाषा कुँड़ुख़

वर्ष 2011 की भाषायी जनगणना रिर्पोट देश के जनमानस के लिए समर्पित है। Census of India – 2011 (Linguistc) के अनुसार भारत में कलु 121 अनुसूचित तथा गैर अनुसूचित भाषाओ को 05 भाषा परिवार समूहों में वर्गीकृत किया गया है| इनमे से 22 भाषाओ को 8वी अनुसूची में स्थान प्राप्त हुआ है| इन 22 में से 15 इंडो-यूरोपियन , 01 ऐस्ट्रो – एशियाटिक , 02 तिब्बतो – बर्मीज एवं 04 द्रविड़यन भाषा परिवार से है|

वगीर्करण निम्न प्रकार है :-

  1. इंडो-यूरोपियन (INDO-EUROPEAN)
    1. इंडो- आर्यन (INDO-ARYAN)
    2. ईरानियन (IRANIAN)
    3. जर्मिनक (GERMANIC)
  2. द्रविड़यन (DRAVIDYAN)
  3. ओस्ट्रो – एशियाटिक (AUSTRO-ASIATIC)
  4. तिब्बतो – बर्मीज (TIBETO-BURMESE)
  5. सेमिटो- हेमिटिक (SEMITO-HAMITIC)

झारखण्ड की भाषाएँ प्रथम तीन भाषा परिवार में से है| इंडो- आर्यन भाषा परिवार में से- संस्कृत, हिन्दी, बगंला, ओड़िया, असमी, पजांबी, मगही, भोजपुरी, मैथली, सादरी या नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुरमाली आदि। ओस्ट्रो – एशियाटिक भाषा परिवार में से- मुंडारी, सतांली, हो, खडिय़ा आदि। द्रविड़ भाषा परिवार में से- कुँड़ुख़ एवं मालतो है| कुँड़ुख़ एवं मालतो को उतरी द्रविड़ भाषा कहा गया है| दक्षिण द्रविड़ भाषा परिवार की मुख्य भाषाओ में से – तमिल, तेलगु ,मलयालम, कन्नड़ आदि है|

इस रिर्पोट के अनुसार अपने देश भारत में कुँड़ुख़/उराँव को mother tongue दर्ज करने वालो की सख्ंया 19,88,350 है, जिनमें से 9,93,346 परूष तथा 9,95,004 महिलाएँ है| यहाँ लिगं अनुपात में महिलाएँ अधिक है| साथ ही यह तथ्य पक्राश में आया कि देश के सभी राज्या एवं केंद्र शासित प्रदेशो में रहकर कुँड़ुख़ भाषी कमोवेश अपनी मातृभाषा, कुँड़ुख़/उराँव दर्ज करवाये है|संख्या की दृष्टि से कुँड़ुख़ को मातृभाषा दर्ज करने वालो में सबसे अधिक संख्या झारखण्ड से है| उसके बाद क्रमवार छत्तीसगढ़, प0बंगाल, ओडिस़ा, बिहार, असम, अंडमान-निकोबार आदि है|जनसंख्या सूचकांक को मानक संख्या 10,000 (दस हजार) से अधिक वाले प्रदेशो की सूची में 6 (छः) राज्य एवं 01 (एक) केंद्र शासित प्रदेश है| तथा 1,50,000 (डेढ़ लाख) से अधिक सख्ंया वाला प्रदेश मात्र 03 (तीन) है, जिसमे झारखण्ड, छत्तीसगढ़ एवं प0बंगाल है।

Distribution of KURUKH/ORAON Non Scheduled language in India as per Census 2011

National Capital Teritory & Union Teritory

झारखण्ड के प्रतिपेक्ष्य में भाषायी जनगणना के आधार पर कइ प्रश्न उठ रहे है। पहला – नवगठित राज्य झारखण्ड में जिसके गठन का आधार संवृद्ध सांस्कृतिक धराहेर बतलाया गया, क्या अब वह सांस्कृतिक विरासत संरक्षित आरै सुरक्षित रहगें ? दूसरा – क्या, वह संवृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन के लिए शिक्षा नीति एवं आदिवासी कल्याण नीति द्वारा यथाेचत मदद मिलगे ? इन प्रश्नो के उत्तर ढूढ़ने से पहले झारखण्ड में अनुसूचित जनजातियों की सूची पर दिष्ट डाला जाए :-

List of Scheduled Tribes in Jharkhand:

  1. Asur
  2. Baiga
  3. Banjara
  4. Bathudi
  5. Bedia
  6. Binjhia
  7. Birhor
  8. Birjia
  9. Chero
  10. Chick Baraik
  11. Gond
  12. Gorait
  13. Ho
  14. Karmali
  15. Kharia
  16. Kharwar
  17. Khond
  18. Kisan
  19. Kora
  20. Korwa
  21. Lohra
  22. Mahli
  23. Mal Pahariya
  24. Munda
  25. Oraon
  26. Parhaiya
  27. Santhal
  28. Sauria Paharia
  29. Savar
  30. Bhumij
  31. Kol
  32. Kanwar

[*Kanwar and Kol added in 8 June 2003 in the annexure and number of Schedule Tribe came to 32]

भारतीय आदिवासी समाज के पास उसकी अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, रूढी़-परम्परा आदि उनकी पुस्तैनी विरासत है। क्या, वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में आदिवासी, अपनी पुस्तैनी धरोहर को संरक्षित एवं सुरक्षित कर पाएंगे? अगर हाँ, तो कैसे? आरै नहीं तो क्यों?

झारखण्ड अलग प्रांत, आन्दोलन के दौरान आदांलेनकारी छात्र नेताओ द्वारा बार-बार यह प्रश्न उठाया जाता था कि – अगर कल के दिन झारखण्ड बनगे तो सिस्टम वही रहगे, जो बिहार में है| यानि मंत्री से लकेर सतंरी तक आरै टेक्नोक्रैट से लकेर व्यरूक्रेटे तक वही पुरानी व्यवस्था रहगे, तो फिर यह आन्दालेन किसके लिए ? पढा़-लिखा वर्ग तो कही भी नाकैरी या व्यापार कर लगे। हमारे गाँव-समाज के लोगो को क्या मिलगे, जो इस आन्दालेन में जूझ रहे है| इस प्रश्न के उत्तर में वे कहते थे- आदिवासी समाज के पास अपनी भाषा है, संस्कृति है, अपनी रूढी़-परम्परा है|अगर आन्दालेन के माध्यम से यह धराहेर बच जाता है तो हम आन्दालेन को सफल मानेंगे| इसके लिए भाषा को बचाना होगा। भाषा बचगे तभी संस्कृति बचेगा और भाषा तभी बचेगा जब भाषा की पढाई प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक हो आरै आज के भूमंडलीकरण के दौर में अपनी आदिवासी भाषा को बचाने एवं निखारने के लिए जो भी माध्यम की जरूरत पड़ेगी, उन बातो को आगे लाना पडगे़ा।

वर्ष 2011 की जनगनणा रिपोर्ट में मातृभाषा के आधार पर जिन अनुसूचित एवं गैर अनुसूचित भाषाओ की गणना की गई है वह आने वाले समय में आदिवासिओं के लिए घोर चितां का विषय है| झारखण्ड की 32 अनुसूचित जनजाति में से मात्र 10-11 भाषाओ को (सतांली को छाडेक़र) गैर अनुसूचित भाषाओ की सूची में दर्ज किया गया है| बाकी 21 आदिवासिओं की भाषा का क्या हुआ? क्या, आने वाले समय में आदिवासिओं के विकास के लिए शिक्षा नीति में स्थान मिलगे ? यदि नहीं, तो वो अपनी भाषा को कैसे बचाऐंगे? क्या, दूसरी ओर जिन आदिवासियां ने अपनी मातृभाषा के रूप में सादरी, नागपुरिया, पचंपरगनियाँ आदि दर्ज कराया है, वह संवृद्ध हिन्दी भाषा को अलंकृत कर रहा है| ऐसे में आदिवासी पहचान कहाँ रहा ?

संदर्भ:-

  1. Census of India 2011 (Linguistic).
  2. WikipediA.
  3. Bakkhuhi Patrika, Vol. 3. page-12
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1 thought on “वर्ष 2011 की भाषायी जनगणना और गैर अनुसूचित मातृभाषा कुँड़ुख़

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