Hindi Language

भारत में बोलियों की लड़ाई और हिंदी भाषा का भविष्य

‘वर्तमान में भारत में हिंदी भाषा के संदर्भ में बोलियों की लड़ाई और हिन्दी के भविश्य पर गंभीर विमर्ष चल रहा है। हिंदी की जिन बोलियों के बलबूते हिंदी को पूरे विश्व में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ, अब वे ही अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाषने में लगी हैं। भोजपुरी, राजस्थानी, कुंमाउनी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, अवधी आदि बोलियां इस दिषा में गंभीरता से प्रयास कर रही हैं। क्षेत्रीय स्तर से लेकर अंतरराश्ट्रीय स्तर की जोर आ। जमाइष हो रही है। आज हिंदी की सबसे बड़ी ताकत बोलियों की वजह से उसका व्यापक संख्याबल है। हिंदी बोलने वालों की दृश्टि से द्वितीय स्थान पर कायम रही है, किंतु विकीपीडिया के एक सर्वे के अनुसार दुनिया की 100 लोकप्रिय भाशाओं में हिंदी को चौथा स्थान प्रदान किया
गया है। देखने पर इसका कारण स्पश्ट समझ में आता है कि इसमें हिंदी की लोकप्रिय बोलियों भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, मगही,हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, धुन्धरी को अलग भाशा के रूप में रखा गया है। यदि इन सब बोलियों के बोलनेवालों की संख्या को हिंदी की संख्या में मिला दिया
जाए तो हिंदी पूर्ववत द्वितीय स्थान पर आ जाएगी। अंतरराश्ट्रीय स्तर पर हिंदी को खंडित करके देखना किसी भी दृश्टि से उचित नहीं है। यदि भाषाई आंदोलनों के दबाव में आकर किसी बोली को संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान दे दिया जाता है तो यह सीधे हिंदी की ताकत अर्थात् उसके संख्या बल पर चोट करेगा और इस स्थिति में हिंदी कमजोर ही होगी साम्राज्यवादी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिल जाएगा।

वोट बैंक की राजनीति के लिए बोली को भाशा बनाए जाने का खेल चलता रहा तो इससे न हिंदी का भला होने वाला है और न ही उस बोली  का। बोलियां अलग होने से हिंदी की षक्ति तो कम होगी ही बोलियां भी अलग-थलग पड़कर कमजोर हो जाएंगी।’’

अधिकांष भाषा विज्ञानी बोली को एक भाषा स्वतंत्र भाशा मानते हैं। उनके लिए दुनिया भर में व्यवहृत प्रत्येक बोली एक स्वतंत्र भाषा है। भाषा विज्ञानियों का एक समूह यह भी मानता है कि दुनिया भर की सभी भाषाएं बोलियां हैं। भाषा वैज्ञानिक दृश्टि से भाशा और बोली में कोई विषेश
अंतर नहीं है। लेकिन सामाजिक व राजनीतिक दृश्टिकोण से यह दोनों ही अलग अलग षब्द हैं। और इनके मायने वा इनके निहितार्थ बहुत व्यापकता लिए हुए हैं। सामाजिक व राजनीतिक दृश्टिकोण से भाषा और बोली में अंतर करना हो तो कहा जा सकता है कि यदि आप किसी
भाशा को पहले से बिना जाने समझ सकते हैं तो यह आपकी भाषा से संबंधित एक बोली है। यदि आप नहीं समझ सकते हैं तो यह आपकी भाशा से भिन्न एक भाशा है हालांकि इस सिद्धांत के बहुत से अपवाद मिलेंगे जैसे हिंदी और उर्दू के मामले में। भाषा ढेर सारी बोलियों का
समुच्चय होता है और प्रत्येक भाशा अपनी बोलियों से पल्लवित, पुश्पित होती है और षक्ति प्राप्त करती है। आज सूचना क्रांति के युग में तकनीकी की मदद से पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज में परिवर्तित हो गई है। अधिकांष लोगों के लिए आज के दौर में स्थानीयता, स्थानिकता,
पारंपारिकता और अपनी संस्कृति से विषेश सरोकार नहीं रह गया है। इसके बावजूद भी यदि हमारे लिए इन चीजों का महत्व है, तो निष्चित तौर पर हजारों वर्शों की मानवीय सभ्यता के विकास क्रम और इसके जरिए पारंपारिकता और अपनी सांस्कृतिक विचारधारा को इसका श्रेय दिया जा सकता है। कोई भी जाति/समाज अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों को अपनी भाशा के माध्यम से सहेज कर रखती है और भाशा के माध्यम से ही पीढ़ी दर पीढ़ी यह विरासत हस्तांतरित होती रहती है। इस वजह से सभी के लिए अपनी मातष्भाशा का विषेश महत्व है। भारत में अधिकांष मातष्भाशाओं को बोली का दर्जा दिया जा सकता है।

इसी महत्व की वजह से भारत में भाशाएं और उसकी बोलियां अपने अस्तित्व की तलाष में राजनीतिक ब्रह्मास्त्र और सांस्कृतिक संघर्श का माध्यम बनी हुई हैं। वर्तमान भारत में हिंदी भाशा की बोलियों के बीच अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाषने के स्वर तेजी से मुखरित हो रहे हैं।
बोलियों को स्वतंत्र अस्तित्व अर्थात भाशा के रूप में मान्यता दिए जाने के उद्देष्य से भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्राप्त के लिए इनके भाशा भाशी  पूरे हिंदी भाशी क्षेत्र में आंदोलित हैं। बात केवल किसी भाशा के आठवीं अनुसूची में सम्मिलित होने तक नहीं है,
उसके दूरगामी प्रभाव की है। संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाशाओं को स्थान दिया गया है। संविधान निर्माण के समय इसमें 14 भाशाएं थी परंतु कुछ भाशा व बोलियों के संघर्श से यह सूची 22 भाशाओं की हो गई है। इस सूची में किसी भाशा/बोली के षामिल हो
जाने मात्र से उस भाशा के साहित्यकारों को विषेश पहचान मिलती है, उस भाशा के विकास के लिए फंड इत्यादि मिलते हैं, इसे अखिल भारतीय सेवा परीक्षाओं में सम्मिलित किया जाता है, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भारतीय मुद्रा पर मुद्रामान भी लिखा जाता है। ये कुछ लाभ हैं
आठवीं अनुसूची में सम्मिलित होने के।

भारत में भाशा के आधार पर कई राज्यों का गठन हुआ है। इस वजह से आठवीं अनुसूची में किसी भाशा के सम्मिलित होने से देर सबेर पष्थक राज्य की मांग उठना स्वाभाविक है। देष के कई हिस्सों में भाशा के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग चल रही है जैसे- बोडोलैंड, मिथिलांचल, बुंदेलखंड, बघेलखंड आदि। नए राज्यों के गठन में कोई बुराई नही है, परंतु इसमें किसी भाशाभाशी की जरुरतों के बजाए प्रषासनिक आधार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, ताकि वर्ग विषेश के लोग इस आधार पर इसे राजनीतिक रंग न दे सकें और अवसरवादी ताकतों को अनुचित लाभ उठाने से रोका जा सके।

भारत के संविधान में जितनी भाशाओं को आठवीं अनुसुची में रखा गया है, उन सबकी कई-कई बोलियां हैं। भारत में लोकप्रिय कहावत है- ष्कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानीष्। इस अनुसार भौगोलिक परिवर्तन के साथ-साथ भाशायी रूपों में भी परिवर्तन आते हैं। एक ही क्षेत्र में भाशा के कई-कई रूप प्रचलित रहते हैं। इनमें से एक रूप यदि दूसरे रूप से पर्याप्त भिन्न होता है तो उन्हें भिन्न-भिन्न बोली की संज्ञा दी जाती है। समय के साथ-साथ इन बोलियों का अपना व्याकरण बनता जाता है, इनमें साहित्य का सृजन भी होने लगता है, इनकी षब्द
सम्पदा भी बढ़ती जाती है। क्षेत्र विषेश में प्रचलित ऐसे सभी रूपों में किसी एक रूप को मानक मान लिया जाता है, उसे भाशा की संज्ञा की दी जाती है। मानक माने गए रूप में आमतौर पर षासन-प्रषासन का कार्य चल रहा होता है, इसमें अन्य बोलियों की अपेक्षाकृत साहित्य सर्जना
भी अधिक होती है और इसे व्याकरण के नियमों से आबद्ध करने के प्रयास किए जाते हैं। समय चक्र में किसी भाशा के अंतर्गत आने वाली कभी किसी बोली को युग की मांग के अनुसार मानक बना दिया जाता है, तो कभ्ाी किसी बोली को। यदि हिंदी भाशा को देखा जाए तो एक समय ब्रज, अवधी को मानक भाशा का दर्जा प्राप्त था, बाद में फारसी मिश्रित हिंदी मानक बनी। वर्तमान में खड़ी बोली हिंदी मानक है। यह क्रम बदलता रहता है। आज हिंदी अपनी सहोदर बहनों के परिवार में सबसे बड़ी बहन है, लेकिन आज जो छोटी हैं, कभी वो भी बड़ी थी। इस
आधार पर हिंदी की ये बोलियां अपने परिवार से बाहर अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाष रही हैं। हालांकि इसके और भी बहुत से दूसरे सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं।

हिंदी जो देष की एकता का परिचायक है, इन्हीं समस्याओं से दो-चार हो रही है। हिंदी की विभिन्न बोलियों को हिंदी से पष्थक कर भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की निरंतर मांग उठाई जा रही है। भारत में हिंदी का लगभग एक हजार वर्शों का इतिहास है। हिंदी ने अपने जिन विविध भाशा रूपों के मेलजोल से एक मानक भाशा के रूप में स्वयं को विकसित किया है, उसमें बिखराव आरंभ हो गया है। यह बिखराव आज के संकुचित राजनीतिक स्वार्थों के कारण आरंभ हुआ है। साथ ही हमारे आपस में लड़ने का फायदा साम्राज्यवादी अंग्रेजी ने उठाया है। अंतरराश्ट्रीय स्तर पर हिंदी को खंडित करके अर्थात हिंदी को उसकी बोलियों से पष्थक दिखाने की षुरुआत की जाने लगी है। हाल ही में विकिपीडिया द्वारा जारी के भाशासूची में हिंदी को विश्व में चौथे स्थान पर दिखाया गया है। इसमें अवधी, ब्रज, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी आदि बोलियों को हिंदी से पष्थक दिखाया गया है। अंतरराश्ट्रीय स्तर पर यह स्थितियां हिंदी के हक में नही हैं।

वर्श 2004 में पूर्वी बिहार में बोली जाने वाली हिंदी की एक बोली ‘मैथिली’ को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया। इसे स्थान मिलते ही हिंदी की दूसरी कई बोलियां स्वयं को आठवीं अनुसूची में स्थान दिए जाने के लिए अपनी आवाज उठाने लगीं। बिहार से भोजपुरी, बज्जिका, अंगिका और मगही को भी इस अनुसूची में स्थान दिए जाने की मांग हो रही है। छत्तीसगढ़ से छत्तीसगढ़ी के लिए मांग की जा रही है। राजस्थान से राजस्थानी के लिए जोर-षोर से मांग की जा रही है। राजस्थानी और भोजपुरी को इस अनुसूची में षामिल करने
के लिए आश्वासन भी मिल गया है। इसी आधार पर कल को उत्तर प्रदेष से कन्नौजी, ब्रज, अवधी के लिए भी मांग उठेगी। हरियाणा से हरियाणवी के लिए भी मांग उठना स्वाभाविक है। उत्तराखंड से गढवाली और कुंमाउनी के लिए आवाज बुलंद होगी। फिर हिंदी किस क्षेत्र की भाशा होगी। भारत की जनगणना 2001 के अनुसार हिंदी के अंतर्गत 49 बोलियां आती हैं। ऐसे में कोई बोली किसी अन्य बोली से कम क्यों रहेगी। ऐसे में तो उसे भी अपनी अस्मिता की तलाष करनी होगी। इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कोलकाता विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष प्रो. अमरनाथ कहते हैं कि ऐसी मांगों से तो हिंदी का समस्त साहित्य ही खंडित होकर रह जाएगा। हिंदी में न विद्यापति रहेंगे, न सूर, न तुलसी, न जायसी, न मीरा, न चंदबरदाई। हिंदी का आदिकाल, स्वर्णयुग भक्तिकाल और रीतिकाल सब समाप्त हो जाएगा, केवल आधुनिक काल रह जाएगा। हिंदी का इतिहास ही बदल जाएगा। हिंदी का विभाजन गिलक्राइस्ट के प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रिटिषकाल में हिंदी और ऊर्दू के रूप में हो गया था। अब क्षेत्र के नाम पर भी उसके विभाजन का खतरा मंडराता नजर आ रहा है। अपनी बोलियों में ही हिंदी की जड़ें हैं। भारत के प्रतिश्ठित समाचार-पत्र ष्द हिंदुष् में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय के पास अभी 38 और भाशाओं को आठवीं अनुसूची में षामिल करने के प्रस्ताव विचाराधीन हैं। जब मैथिली को हिंदी से अलग भाशा का दर्जा दिए जाने की बात हो रही थी तो हिंदी के प्रतिश्ठित
साहित्यकार अज्ञेय जी ने इस पर क्षोभ व्यक्त करते हुए लिखा था कि इस निर्णय का प्रभाव हिंदी भाशा और साहित्य पर तो पड़ेगा ही, आज के दूशित वातावरण में भाशा वैमनस्य को और बढ़ावा देगा। मैथिली को स्वतंत्र भाशा के रूप में मान्यता देना हिंदी के सार्वजनिक चरित्र और संभावनाओं के हित में तो नही ही है। ऐसा तुश्टिकरण क्षेत्रीय अलगाववादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करना और राश्ट्रीय सोच को संकुचित करना भी है।

भारत में तुश्टिकरण की राजनीति के चलते ऐसे फैसलों पर बिना सोचे-समझे अगर कोई निर्णय हो जाए तो इस पर कोई आष्चर्य नही होगा, क्योंकि वोट सभी को चाहिए। अज्ञेय जी की उपर्युक्त चिंता अकारण नही थी। उनकी आषंका की पुश्टि दिनांक 02 जून, 2015 को बेगुसराय
मीडिया डाट काम में छपी एक खबर से होती है, जिसमें लोकसभा सांसद कीर्ति आजाद कहते हैं कि संविधान की आठवीं अनुसूची में षामिल बिहार की एकमात्र भाशा मैथिली को राज्य की राजकीय भाशा का दर्जा दिए जाने का संघर्श तेज किया जाएगा। यह विशय संसद कई आगामी
सत्र में जोरदार ढंग से उठाया जाएगा। इसके साथ ही उन्होने कहा कि अलग मिथिला राज्य के लिए संघर्श तेज किया जाएगा।

मैथिली को भाशा का दर्जा दिए जाने के बाद भोजपुरी भाशियों को भी अपनी बोली में संकट दिखाई पड़ने लगा। उन्होने भोजपुरी को इस अनुसूची में स्थान दिलाए जाने के लिए संघर्श तेज किया। हालांकि भोजपुरी को इस सूची में स्थान दिए जाने के लिए संघर्श पिछले 47 वर्शों से चल रहा है। भोजपुरी 16 देषों के 20 करोड़ लोगों की भाशा है। इसी क्रम में राजस्थानी बोली बोलनेवाले भी इसे आठवीं अनुसूची में देखना चाहते हैं। पहली बार राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देने की मांग 1936 में उठी थी। राजस्थानी भाशा मान्यता संघर्श समिति इसके लिए लगातार संघर्श कर रही है। करीब 7 करोड़ लोगों की राजस्थानी बोली किसी एक बोली का नाम नही है बल्कि यह 09 बोलियों का समूह है। इसके किस रूप को मान्यता देनी है, वह अभी बहुत स्पश्ट नही हो पाया है। राजस्थानी की बहुत सी बोलियों का वजूद भी खतरे में पड़ता जा रहा है।

आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करके भाशा का दर्जा दिए जाने के उद्देष्य से छत्तीसगढ़ी के लिए भी लम्बे समय से संघर्श चल रहा है। छत्तीसगढ़ी राज्य के गठन का आधार छत्तीसगढ़ी भाशा ही है। छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने के लिए राज्य में कई प्रयास किए जा रहे हैं। यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ में रेलवे उदघोशणा छत्तीसगढ़ी में की जा रही है। राज्य द्वारा राजकीय मान्यता भी प्रदान की गई है। फिल्में बनाई जा रही हैं। टीवी, रेडियो आदि पर कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा है।

इस तरह से भारत में हिंदी भाशी क्षेत्र में कई बोलियां अपनी अस्मिता को लेकर संघर्शरत हैं। ये बोलियां हिंदी से अलग अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। हिंदी से अलग होने का मतलब हिंदी को कमजोर करना है। हिंदी की बोलियां ही उसकी ताकत हैं। जिस तरह से एक-एक
करके बोलियां अलग होना चाह रही हैं, वैसे में हिंदी के ऊपर खतरा मंडराने लगा है। इससे हिंदी की संख्या बल पर सीधी चोट आ रही है। विकिपीडिया में भाशाओं पर जारी एक रिपोर्ट में हिंदी को चतुर्थ स्थान दिया गया है जबकि डॉ. जयंती प्रसाद नौटियाल ने अपने एक षोध
द्वारा साबित किया है कि बोलने वालों की संख्या की दृश्टि से हिंदी दुनिया में प्रथम स्थान पर है। इसका कारण यह है कि विकिपीडिया द्वारा जारी सूची में हिंदी की तमाम बोलियों को हिंदी से अलग दिखाया गया है। साम्राज्यवादी ताकतों ने हिंदी की बोलियों की लड़ाई का फायदा उठाना षुरु कर दिया है। बोलियों की लड़ाई से हिंदी कमजोर होगी, उसकी संख्या बल घटेगी। इसका फायदा अंग्रेजी को मिलेगा और उसका वर्चस्व भी बढ़ेगा।

यदि भारत के अंदर हिंदी कमजोर होगी, तो हम भला किस आधार पर संयुक्त राश्ट संघ की आधिकारिक भाशा का दर्जा दिलवा पाएंगे। अंतरराश्ट्रीय स्तर पर हिंदी को प्रतिश्ठित करने के लिए इसे अपने घर के भीतर मजबूत करने की बहुत सख्त आवष्यकता है। तभी संयुक्त राश्ट्र संघ की आधिकारिक भाशा के रूप में दर्जा दिलाने के लिए विश्वव्यापी समर्थन हासिल किया जा सकेगा।

भारत के संविधान के लागू होने 66 वर्श बाद भी हम आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी भाशाओं में षिक्षा-दीक्षा, रोजगार की समुचित व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। इसमें से तमाम भाशाएं केवल विश्वविद्यालय स्तर पर एक विशय के रूप में पढ़ाई जा रही हैं और स्थानीय स्तर पर संपर्क का
एक माध्यम बनी हुई हैं। यदि हिंदी की इन बोलियों को आठवीं अनुसूची में स्थान दे भी दिया जाए तो भी इन बोलियों का कोई विषेश भला नही होने वाला है, अपितु हिंदी का तो नुकसान होना तय है। होना तो ये चाहिए कि सभी बोलियों के प्रयोगकर्ता आठवीं अनुसूची का चक्कर
छोड़कर अपनी मातष्भाशाओं का अधिकतम प्रयोग करते हुए बिना किसी पूर्वाग्रह के हिंदी के विकास में अपना योगदान दें। यही अपनी मातष्भाशा/अपनी बोली और हिंदी की सच्ची सेवा होगी। अभी भी भारत में हिंदी में उच्च षिक्षा नही दी जा रही है, ऐसे में जिन बोलियों को
आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए आंदोलन हो रहे हैं, उनमें उच्च षिक्षा की व्यवस्था कैसे बनाई जा सकेगी। साथ ही इस दिषा में हिंदी में किए जाने वाले प्रयास अवष्य क्षीण होंगे। हिंदी की सभी बोलियों के प्रयोगकर्ताओं को संयुक्त रूप से हिंदी को षिक्षा व ज्ञान-विज्ञान की प्रमुख भाशा बनाने के लिए अवष्य प्रयत्न करना चाहिए। मात्र भाशा की राजनीति करने से न तो उस बोली का भला होने वाला है न ही हिंदी भाशा का। इससे अंततरू भारतीय भाशाओं के विकास का मुद्दा गौण होता जा रहा है और भाशायी कट्टरता का विस्तार होता जा रहा है।

भारत के संविधान में भाशा की बात तो प्रमुखता से की गई है। हिंदी को बढ़ावा देने तमाम उपाय भी किए गए, परन्तु बोलियों के संरक्षण, बोलियों के विकास, बोलियों को समष्द्ध बनाने के लिए कोई बात नही की गई है। संविधान में इस संबंध में भी पर्याप्त प्रावधान किए जाने चाहिए थे ताकि सभी बोलियों के प्रयोगकर्ताओं को अपनी अस्मिता तलाषने के लिए संघर्श न करना पड़ता और आज इन संघर्शों के दुश्परिणाम किसी भाशा पर न दिखाई देते। आज से समय में हिंदी की तमाम बोलियां लुप्तप्राय हो रही हैं, इन सबको अनिवार्य तौर पर संरक्षित करना चाहिए।
इनको संरक्षित करने के लिए मात्र संविधान की आठवीं अनुसूची में डाल देने से कुछ नही होने वाला है। बल्कि इनके संरक्षण के लिए विषेश षोध केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, इसके साहित्य को संरक्षित करना चाहिए, फिल्में बनाई जानी चाहिए, इन्हें पढने के लिए विषेश छात्रवष्त्ति
दी जानी चाहिए। किसी भी भाषा का संरक्षण करने के नाम पर किसी अन्य भाशा को कतई कमजोर करने की कोई कोषिष नही की जानी चाहिए।

यदि बोलियों के विवाद के मूल में जाया जाए, तो स्पश्ट तौर पर समझ में आ जाएगा कि ये सारे विवाद किसी स्वार्थ विषेश से प्रेरित होकर निर्मित हैं। प्रसिद्ध भाशाविज्ञानी डॉ. रबींद्र नाथ श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक भाशा अस्मिता और हिंदी में लिखा है कि यदि इन समस्याओं पर समय रहते हमने ध्यान न दिया तो विभिन्न प्रकार जातियों/उपजातियों में बंटा भारतीय समाज और अधिक क्षत-विक्षत हो जाएगा, क्योंकि कोई भी भाशा समाज को जोड़ने का काम करती है और समाज के सदस्यों को अंदरूनी तौर पर जोड़ने का ये सर्वाधिक ताकतवर हथियार है। इसी प्रकार समाज को तोड़ने में भी ये उतना ही अधिक कारगर हथियार है।

इन विवादों से परे यदि हिंदी के भविश्य की बात की जाए तो भविश्य बड़ा ही सुनहरा दिखता है। आज हिंदी वैश्विक स्तर पर बाजार की भाशा बनी हुई है। दुनियां भर की कंपनियां भारत में आकर हिंदी में व्यापारिक गतिविधियां कर रही हैं। इससे कम्पनी का व्यापार तो फल-फूल रहा
ही है, साथ ही हिंदी की लोकप्रियता भी बढ़ती जा रही है।  आज के समय में बोलियों का हिंदी के बाहर अपना वजूद तलाषना मुख्य धारा से अलग-थलग पड़ जाना है। अतरू बोलियों के प्रयोगकर्ताओं को केवल अपने बारे में ही नही बल्कि पूरे समूह अर्थात हिंदी परिवार की प्रगति के बारे में सोचना चाहिए। अंग्रेजी के वर्चस्व और साम्राज्यवाद को तोड़ने के लिए भारत की सभी भाशाओं और बोलियों को एकजुट होना पड़ेगा अन्यथा हम अंग्रेजी के वर्चस्व से सदैव आतंकित होते रहेंगे।

संदर्भ :-
1. Recociling Linguistics Diversity : The History and the Future of Language Policy in India] Jason Bridge] Aug 1996
2. श्तलाष भोजपुरी अस्मिता कीश्, लेखक – अजित दुबे, प्रकाषक – इंडिका इंफोमीडिया
3. श्भाशा अस्मिता और हिंदीश्, लेखक – डॉ. रबिंद्र नाथ श्रीवास्तव
4. श्बिहार एक सांस्कृतिक वैभवरू, लेखक – डॉ. षंकर दयाल सिंह
5. श्भारत की भाशा समस्याश्, लेखक – डॉ. रामविलास षर्मा, प्रकाषक – राजकमल प्रकाषन
6. श्भाशा और समाजश्, लेखक – डॉ. रामविलास षर्मा, प्रकाषक – राजकमल प्रकाषन
7. श्भोजपुरी – भाशा, साहित्य और संस्कृतिश्, लेखक – प्रो. विजय कुमार
8. श्राजस्थानीरू भाशा- साहित्य-संस्कृतिश्, लेखक- राम प्रसाद दधीचि

 

– दिलीप कुमार सिंह,
उप प्रबंधक (राजभाषा), भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, राजभाशा
विभाग, कोयला भवन, कोयला नगर, धनबाद (झारखं) – 826005

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