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तोलोङ सिकि (Tolong Siki) का कंप्यूटरी अवतार ‘केलि तोलोङ’ की उद्भव यात्रा

हमेशा से हम सुनते आये थे, कोई भाषा तबतक परिपूर्ण नहीं होती जब तक उसके बोल के साथ उसकी अपनी लिपि न हो। कुँड़ुख़ को लिखने के लिए कल तक देवनागरी या रोमन लिपि का प्रयोग किया जाता था। अब इसकी अपनी लिपि है, तोलोंग सिकि। प्रसन्नता की बात है, तोलोंग सिकि अब प्रयोग में आ चुकी है। तोलोंग सिकि ने देश-विदेश के कुँड़ुख़ भाषियों को संवाद का नया आयाम दिया है।

मुझे याद आता है, करीब दो दशक पहले, युवा चिकित्सक डॉ नारायण उराँव से परिचय हुआ था। फादर प्रताप टोप्पो इन्हें लेकर मेरे पास आये थे। पत्रकार होने के नाते मुझे लगा कि जरूर चिकित्सा संबंधी कोई समाचार या लेख का मामला होगा। लेकिन, पता चला कि यह महाशय तो साहित्य के धुनी हैं। आदिवासी भाषा की लिपि विकसित करने में जुटे हैं। डाक्टरों के बारे में ठोस धारणा है कि एक बार एम.बी.बी.एस. की डिग्री मिल गई तो आजीवन मुद्रा अर्जन की समस्या से निदान मिल जाता है। सरकारी नौकरी के बावजूद प्राइवेट प्रैक्टिस का लोभ छोड़ना मुश्किल होता है। और यह आदिवासी युवा डॉक्टर लिपि बनाने में धुनी रमाने की बात कर रहा है! थोड़ा सशंकित था।

बहरहाल, फादर टोप्पो ने चर्चा शुरू की ……… लिपि तो तैयार हो गई है लेकिन अब समस्या है इसे कंप्यूटर में कैसे लाया जाये। क्योंकि जबतक लिपि का फॉन्ट नहीं बनता, पुस्तकें छपेंगी कैसे? ………… उन दिनों मैं एक स्थानीय हिंदी दैनिक अखबार के लिये कंप्यूटर विज्ञान पर ‘सूचना तकनीक’ नाम से पूरे पन्ने का एक साप्ताहिक मैगजिन का संपादन भी करता था। फादर टोप्पो के सहज व्यक्तित्व का मैं शुरू से ही बहुत सम्मान करता था। लेकिन, उनकी समस्या के बारे में सुनकर मैं भी लाचार हो गया। दरअसल उन दिनों फॉन्ट बनाने की गिनी चुनी कंपनियाँ ही भारत में थीं। जाहिर है उनकी फीस भी मनमानी होगी। वैसे भी फॉन्ट टेक्नोलॉजी से आम कंप्यूटर उपयोगकर्त्ताओं का क्या वास्ता! मैं भी बहुत जानकारी नहीं रखता था। काफी देर बातचीत के बाद मैं उन दो भद्रजनों को इतना ही आश्वस्त कर पाया कि मुझे कुछ वक्त दीजिए, पता करना होगा।

उनके जाने के बाद मैंने इंटरनेट खंगालना शुरू किया। चंद रोज में मुझे इतना अहसास होने लगा कि थोड़ी अतिरिक्त पढ़ाई की जाये तो फॉन्ट विकसित किया जा सकता है, हालांकि काम काफी जटिल था। लेकिन इसी बीच मुझे लगा कि यही अवसर है अपने प्रदेश की माटी और यहाँ के मूलवासियों के साथ अंतरंग संबंध स्थापित करने का। और, मैंने फादर टोप्पो व नारायण जी से संपर्क किया। बातचीत फिर हुई। मैंने कहा कि मैं प्रयास करूँगा, बशर्ते डॉ. नारायण को मेरे साथ समय-समय पर परामर्श के लिये उपलब्ध होना होगा। डॉक्टर नारायण झट तैयार हो गए। उसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा। इस दौरान मैंने महसूस किया कि डॉ. नारायण उराँव की धुन को लेकर मेरी आशंका बिल्कुल निर्मूल थी। यह तो वाकई योगी हैं। दिन हो या रात, नारायण हमेशा
उपलब्ध होने को तत्पर होते। फॉन्ट के लिए पेपर पेंसिल पर डिजाईन करने से लेकर आम उपयोगकर्त्ताओं की सुविधा के लिये अनवरत प्रयोग और शोध तक ….. तोलोंग सिकि के उद्भवकर्त्ता डॉ. नारायण उराँव को साधुवाद!

इधर, इंटरनेट से फॉन्ट डिजाईनिंग की जानकारी के आधार पर मैं फॉन्ट डिजाईन में लगा रहा। महीनों लगे। इस काम में मेरी धर्मपत्नी श्रीमती रेवा का भी भरपूर सहयोग मिलता रहा। तोलोंग सिकि फॉन्ट का पहला संस्करण तैयार हुआ। बात सेवा शुल्क की आयी। मैंने डॉ. उराँव से खुलकर कहा, मेरी एक ही बेटी है ‘केलि’, मेरी इच्छा है इस फॉन्ट के साथ मेरी बेटी का नाम जुड़े और यह फॉन्ट आम लोगों के लिए निःशुल्क उपलब्ध हो। इसपर वे सहमत हो गए और कार्य बढ़ता गया। इस तरह ‘केलि तोलोंग (kellytolong) फॉन्ट का जन्म हुआ। वर्ष 2002 में इसका लोकार्पण हुआ। उसके बाद लगातार सुधार होते गए। कालांतर में इस सॉफ्टवेयर के कई संस्करण तैयार हुए। हालिया संस्करण मैंने 2017 के अंत में तैयार किया जो तोलोंग सिकि डॉट कॉम (tolongsiki.com) पर पूरी दुनिया के लिये निःशुल्क उपलब्ध है।

किसलय
वरिष्ठ पत्रकार, राँची।

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1 thought on “तोलोङ सिकि (Tolong Siki) का कंप्यूटरी अवतार ‘केलि तोलोङ’ की उद्भव यात्रा

  1. The great sensational work of with Kislay Dr. Narayan Oraon really turned sage, it’s matter of satisfaction that we have now two big hands of Kislay and Dr. Narayan have raised the flag of kurukh language. Along with this Fr. Pratap Toppo is rightfully to be mentioned as lamp post to the great work. – Rajendra Bhagat Chief Manager, Union Bank Of India.

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