History Of Kurukh Language

कुँड़ुख़ (kurukh) भाषा एवं तोलोङ सिकि (Tolong Siki) का इतिहास(कुँड़ुख़ कत्था अरा तोलोङ सिकि गही इतिङख़िरी) |

कुँड़ुख़ (kurukh) कत्था अरा तोलोङ सिकि(Tolong Siki) गही इतिङख़िरी (कुँड़ुख़ भाषा एवं तोलोङ सिकि का इतिहास) के संबंध में दो शब्द लिखकर मुझे हार्दिक खुशी हो रही है। संयोगवश, मैं तोलोङ सिकि (लिपि) के जनक डॉ. नारायण उराँव की धर्मपत्नी हूँ और शादी के बाद से ही मुझे तोलोङ सिकि की विकास यात्रा के घटना क्रम को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। वैसे, कुँड़ुख़ भाषा सीखने एवं समझने का मौका बचपन से युवावस्था तक नहीं मिल सका। पढ़ाई-लिखाई के लिए मैंने संस्कृत विषय का चुनाव किया। स्नातकोत्तर अध्ययन के क्रम में मुझे, संस्कृत एवं कुँड़ुख़, दो प्राचीन भाषाओं की संरचना को समझने का मौका मिला। किन्तु सामाजिक बैठकों में भाषा नहीं जानने की कमी चुभती रही। वैसे,वर्तमान में मैं गॉस्सनर कॉलेज, राँची के संस्कृत विभाग में अध्यापिका हूँ। अध्ययन के दौरान पता चला कि संस्कृत जिस तरह भाषायी अभिव्यक्ति में अति समृद्ध है, उसी तरह कुँड़ुख़ भी इस विषय में अतिशय समृद्ध है।

इन तथ्यों को परिमार्जित करते हुए समाज के चिन्तकों, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा अपने पूर्वजों की अवधारनाओं को लिपि चिह्नों के माध्यम से मूर्त रूप दिये जाने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में वर्ष 1989 से जून 2018 तक तोलोंग सिकि की विकास यात्रा तथा आदिवासी समाज के बुद्धिजीवियों एवं समाज सेवियों द्वारा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए किये गये कार्यों का सचित्र प्रस्तुतिकरण है। कुँड़ुख़ भाषा एवं तोलोङ सिकि का इतिहास को पुस्तक रूप देने में कई अलग-अलग क्षेत्रों में मुझे सामंजस्य स्थापित करना पड़ा। प्रथम तो तोलोङ सिकि के जनक की धर्मपत्नी के नाते, उनके एवं उनके पूरे परिवार को जोड़कर रखना था। यह किसी कामकाजी महिला के लिए एक चुनौती भरा कार्य होता है। दूसरी बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी बच्चों का लालन-पालन एवं उनकी शिक्षा। इस संबंध में भी मुझसे जितना बन पड़ा मैंने अपने दोनों बेटों के प्रति एक जिम्मेदार माता का रोल अदा किया। ससुराल में पाँच ननद की एकलौती भाभी का रिश्ता तथा गाँव-समाज में रिश्ता भले ही खट्टा-मीठा रहा हो, पर एक सामाजिक तथा पारिवारिक रिश्ते की जिम्मेदारी सहित, पत्नी धर्म अच्छे से निभा पायी हूँ। हमेशा से ही मैं माननी रही कि समाज एवं परिवार जनों की संतुष्टि ही मेरी कसौटी है। जहाँ तक कई लोगों की जिज्ञासा रही है कि कुँड़ुख़ भाषा एवं लिपि के विकास में मेरी क्या भूमिका रही है? तो इस संबंध में मैं यह नहीं कह पाती कि इसमें मेरी भागीदारी सीधे तौर पर क्या रही है, पर परोक्ष रूप से मैं इस विकास यात्रा की हमेशा संगिनी बनी रही। मेरी सदा ही कोशिश रही है कि पति के उपर मैं बोझ न बनूँ बल्कि उनकी तपस्या में यथाशक्ति सहभागी बनी रहूँ। वे अपने सरकारी सेवा के दौरान प्रायः ही राँची से बाहर रहे। इस दौरान बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तथा अन्य पारिवारिक जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ वे अपनी साधना में लगे रहे।

इसके अलावे, लेखक पति को संभालने जैसा दुरूह कार्य भी मुझे ही करना था। विगत 26 वर्षों के शोध-कार्य के दौरान पति महोदय यदा-कदा उदास हो जाते, तो कभी आपा खो देते। इन परिस्थितियों में उनका मनोबल भी न गिरे इस पर भी मेरा ध्यान रहा। इसी तरह समाज में विभिन्न विषयों के अनेकों महारथी हैं और उन सबों को संतुष्ट करते हुए समाज के हित में किसी भाषा की लिपि जैसे जटिल विषय को एक मूर्त्त रूप दिया जाना सचमुच आसान नहीं था। संस्कृत विषय में ज्ञान और अभिरूची रखना शायद मेरे पति के काम आया और कई मुश्किल सवालों का जवाब ढूंढ़ने में मददगार हुई। सामाजिक शिक्षा और आध्यात्म विषय पर चर्चा हो तो वे मुझसे अपने विचार बाँट लिया करते थे। इस तरह, सामाजिक कसौटी पर खरा उतरते हुए सरकारी सिस्टम तक पहुँचने जैसे दुरूह कार्य को तोलोङ सिकि (लिपि) के रूप में झारखण्ड और प. बंगाल सरकार से मान्यता मिलने तक की यात्रा, मेरे लिए अकथनीय है। इस संकलन एवं सम्पादन में यदि किसी तरह की भूल-चूक हुई हो तो हमें पत्र लिखकर सूचित करने की कृपा करें अथवा  oraon.narayan@gmail.com में अपनी भावना प्रेषित करें।

 

शोध एवं अनुसंधान                                                                                                            संपादक एवं प्रकाषक

डॉ0 नारायण उराँव ‘सैन्दा                                                                                         डॉ0 (श्रीमती) जयेति टोप्पो ‘उराँव’

 

 

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1 thought on “कुँड़ुख़ (kurukh) भाषा एवं तोलोङ सिकि (Tolong Siki) का इतिहास(कुँड़ुख़ कत्था अरा तोलोङ सिकि गही इतिङख़िरी) |

  1. A Tale Couple कहे तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। इतने बड़े कार्य को करने आपने मानसिक एवं शारीरिक रूप से जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है, सचमुच सराहनीय है।

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