Meenakshi Temple of Madurai, Kurukh, Tamil, Tolong Siki

कुँडुख (Kurukh) पर द्रविड़ कुल की तमिल भाषा के प्रभाव पर त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा : एक समीक्षा

कुँडुख (उराँव) पर द्रविड़ कुल की तमिल भाषा के प्रभाव पर अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा 23, 24 एवं 25 फरवरी 2013 को सम्पन्न ह्ुई। इस परिचर्चा में चार तमिल भाषी विद्वान एवं राँची विश्वविद्यालय, राँची के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के कुँड़ुख़ प्राध्यापक तथा शोधार्थियों ने अपनी प्रस्तुति पेश की। परिचर्चा में शान्ति निकेतन ह्न्दिी प्रचारिणी सभा की ओर से डॉ0 रामचन्द्र राय एवं सेन्ट्रल इंस्टियूट ऑफ क्लासिकल तमिल की ओर से डॉ0 एम0 सुब्रमण्यम, डॉ0 पी0 के0 बालसुब्रमण्यम, डॉ0 गोविन्दराजन और डॉ0 पी0 कोकिला तथा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की ओर से डॉ0 हरि उराँव एवं शोधार्थी तथा छात्र गण उपस्थित थे।

भाषा वैज्ञानिकों का मानना है कि दोनों भाषा प्राचीन भाषाओं में से है। इसे द्रविड़ भाषा समूह में वर्गीकृत किया गया है। इस वर्गीकरण के अनुसार कुँड़ुख़ को उतरी द्रविड़ तथा तमिल को दक्षिणी द्रविड़ कहा जाता है। वर्तमान में तमिल एक विकसित तथा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल है, जबकि कुँड़ुख़ भाषा यूनेस्को के नजरिये से विलोपन की ओर जा रही भाषा है। इस परिचर्चा में इस बात की जानकारी मिली कि द्रविड़ मूल ही भाषा की संख्या करीब 85 है तथा इस समूह की भाषा के बोलने वाले लोग लगभग 21 करोड़ 70 लाख हैं। इस त्रिदिवसीय परिचर्चा में पहली बार दोनों, उतरी एवं दक्षिणी द्रविड़ कूल के लोग आमने सामने आकर अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। परिचर्चा में कुल 18 शोध पत्र पढ़े गये। इनमें से 2 शोध पत्र अंग्रेजी में पढ़े गये तथा शेष 16 हिन्दी में प्रस्तुत किये गये।

इस परिचर्चा में एक महत्वपूर्ण बात उजागर हुई। तमिल भाषी विद्वान डॉ0 पी0 के0 बालसुब्रमण्यम ने अपने प्रथम सम्बोधन में ही कहा कि – हम सबों की भाषा को दुनियाँ द्रविड़ समूह की भाषा कहती है किन्तु यह द्रविड़ शब्द प्राचीन तमिल साहित्य एवं व्यवहार में कहीं भी नहीं है। यह द्रविड़ शब्द कहाँ से आया तथा कब और किसने दिया यह वृहत शोध का विषय है। इस प्रश्न के उत्तर में दूसरे दिन 24 फरवरी को अपने शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए पेशे से चिकित्सक डॉ0 नारायण उराँव ‘सैन्दा’ द्वारा बतलाया गया कि द्रविड़ शब्द प्राचीन संस्कृत साहित्य मनुस्मृति के अध्याय 10, श्लाोक संख्या 43 (संस्कृति संस्थान, वेद नगर बरेली, यू0पी0) में उ़द्धृत है। उद्धृत श्लोक का आशय इस प्रकार है – यज्ञ कराने, पढ़ाने, प्रायश्चित्तादि कराने के निमित्त ब्राह्मणों का दर्शन न होने से पौण्ड्रक, चौड्र, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, किरात, दरद और खश ये क्षत्रीय जातियाँ धीरे-धीरे उपनयनादि संस्कारों से भ्रष्ट होकर शूद्रत्व को प्राप्त हो गईं।

तीसरे दिन, नेपाल से आये प्रतिभागी श्री राम किसुन उराँव द्वारा बतलाया गया कि विदेशी साहित्यकारों द्वारा द्रविड़ मूल की भाषाओं को एक साथ संबोधन करने हेतु द्रविड़ शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तकों में किया है। श्री राम किसुन उराँव के अंग्रेजी में पढ़े गये लेख के अनुसार – The existence of the Dravidian language family was first suggested by Alexander D. Compbell in his Grammar of the Teloogoo Language. Fransis W. Ellis and A. D. Campbell had pointed that Tamil and Talugu were descended from a common,          non-Indo-European ancestor. When Robert Cadwell published his Comparative Grammar of the
Dravidian South-Indian family of language in 1856, that considerably expanded the Dravidian umbrella and established one of the major language family of the world. He coined the term “Dravidian” from the Sanskrit dra:vida in 7th century to refer to the Tamil language of the South of India.

परिचर्चा का समापन 25 फरवरी को दोपहर के भोजन के बाद सम्पन्न हुआ। समापन समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में राँची विश्वविद्यालय, राँची के कुलपति, डॉ0 एल0 एन0 भगत थे। उन्होंने अपने सम्भाषन में कहा – कुँड़ुख़ एवं तमिल भाषा में काफी समानता है। दोनों ही द्रविड़ कुल की भाषा है। तमिल साहित्यविकसित है और कुँड़ुख के लिए बड़े भाई की तरह है। इसी तरह तमिल विद्वान डॉ0 पी0 के0 बालसुब्रमण्यम ने कहा – कुँड़ुख़ (उराँव) लोग 2500 वर्ष पूर्व बिछड़े हुए हमारे भाई हैं। हम इनकी भाषा को मरने नहीं देंगे। हम इनकी आवाज बुलंद करने में मदद करेंगे।

इस परिचर्चा को सफल बनाने में राँची विश्वविद्यालय, राँची के प्रोफेसर डॉ0 करमा उराँव, डॉ0 दिवाकर मिंज, कुँड़ुख़ भाषा प्रेमी, ए0 डी0 एम0 श्री उपेन्द्र नारायण उराँव, डॉ0 निर्मल मिंज, फा0 अलबिनुस मिंज, फा0 अगस्तिन केरकेट्टा, श्री सरन उराँव आदि तथा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के भाषाप्रेमी शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

परन्तु वी. एस. आप्टे की पुस्तक, द स्टूडेन्टस संस्कृत-इंगलिष डिक्सनरी पृष्ठ 263 में द्रविडः
शब्द की व्याख्या अलग तरीके से किया हुआ है। इस डिक्सनरी के अनुसार द्रविड़ शब्द का अर्थ  1. Dravidian, dravida  2. A general name for a Brahmana of any of the five tribes (the द्रविड ) कर्णाट, गुर्जर, महाराष्ट्र and तैलंग है। इस तरह मनुस्मृति और द स्टूडेन्टस संस्कृत-इंगलिश डिक्सनरी में दो अलग-अलग विचारधारा अथवा क्षेत्र बात की प्रस्तुति है। मनुस्मृति में द्रविड लोगों के बारे में कहा गया है कि वे क्षत्रीय वशंज के थे, पर वे अपने पूजा-पाट, अनुष्ठान आदि में ब्राह्मणों के दर्शन न करने तथा यज्ञ आदि से दूरी बनाये रखने के चलते शूद्र जाति समूह के हो गये। दूसरी ओर वी. एस. आप्टे की पुस्तक, द स्टूडेन्टस संस्कृत-इंगलिष डिक्सनरी में दक्षिण भारतीय पाँच जतपइम (द्राविड, कर्णाट, गुर्जर, महाराष्ट्र ंदक तैलंग अर्थात वर्तमान के पाँच राज्यों में निवासरत ट्राइब के ब्राह्मणों के लिए प्रचलित शब्द है।) इन पारिभाषिक शब्दावली में से जतपइम का अर्थ हिन्दी में क्या होता है, यह अबतक स्पष्ट नहीं है। अबतक किसी भी डेक्सनरी में जतपइम का अर्थ ठीक-ठीक नहीं बतलाया गया है। जैसे कि अंग्रेजी बाइबिल में जतपइम शब्द का प्रयोग सैकड़ो बार हुआ है, पर उसका हिन्दी रूपान्तर बाइबिल में जतपइम का अर्थ स्पष्ट नहीं है।

वहीं पर भाषाविदों के अनुसार पूरे देश में अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं को मुख्य
रूप से चार भागों में वर्गीकृत किया गया है – 1. आर्य भाषा परिवार 2. आष्ट्रिक भाषा परिवार 3. द्रविड़ भाषा
परिवार एवं 4. तराई क्षेत्रीय भाषा परिवार। झारखण्ड की भाषाएँ प्रथम तीन भाषा परिवार में से है। आर्य भाषा
परिवार में से – संस्कृत, हिन्दी, बंगला, ओड़िया, असमी, पंजाबी, मगही, भोजपुरी, मैथिली, सादरी या नागपुरी,
खोरठा, पंचपरगनियाँ, कुरमाली आदि। आष्ट्रिक भाषा परिवार में से – मुण्डारी, संताली, हो, खड़िया आदि।
द्रविड़ भाषा परिवार में से – कुँड़ुख़ एवं मालतो है। कुँड़ुख़ एवं मालतो को उतरी द्रविड़ भाषा की श्रेणी में रखा
गया है। दक्षिण द्रविड़ भाषा परिवार की मुख्य भाषाओं में से – तमिल, तेलगु, मलयालम कन्नड़ आदि है।

इस तरह tribe एवं द्रविड़ (dravida) शब्दों का अर्थ क्या समझा जाय, यह भी एक अबूझ पहेली है।
संदर्भ सूची :-
1. मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लाोक संख्या 43 (संस्कृति संस्थान, वेद नगर बरेली, यू0पी0)।
2. श्री राम किसुन उराँव (एम.ए., लिंग्विस्टिक) द्वारा अंग्रेजी में पढ़ा गया लेख।
3. संस्कृत इंगिलश डेक्सनरी, लेखक – वी.एस.आप्टे।
4. दिनांक 24, 25 एवं 26 फरवरी 2013 को छपे स्थानीय दैनिक समाचार पत्र।

संकलन एवं समीक्षा : डॉ0 श्रीमती ज्योति टोप्पो
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, गॉस्सनर कॉलेज, राँची (झारखण्ड)।

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