Education System

आदिवासी (Tribal) समाज और सरकार की मातृभाषा शिक्षा योजना

कहा जाता है – प्रत्येक आदिवासी समाज के पास उसकी अपनी विशिष्ट भाषा एवं संस्कृति है। पर क्या, आज के दौर में सभी आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट पहचान को बरकरार रख पा रही है। यदि नही, तो क्यों ? यदि बचाया जाना चाहिए, तो कैसे ?

इस लेख के माध्यम से हम झारखण्ड की आदिवासी भाषाओं के बारे में चर्चा करेंगे। देश की आजादी के बाद देश एवं राज्य में नई शिक्षा नीति लागू हुई। फिर भारतीय शिक्षा आयोग (कोठारी मिशन) बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई। इन सभी नीतियों में भाषा एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। झारखण्ड में भी झारखण्ड शिक्षा नीति लागू है। (**अनुलग्नक – 1 से 26, पृ0 8 से 33)

देश की आजादी के बाद बिहार सरकार के शिक्षा विभाग का संकल्प संख्या – 645 E.R. of Ranchi, 13th August 1953 के अवलोन से पता चलता है कि सरकार द्वारा प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दिये जाने हेतु क्रमशः हिन्दी, बंगला, उड़िया, उर्दू, मैथिली, संथाली, उराँव, हो, मुण्डारी एवं अंग्रेजी (एंग्लोइंडियन के लिए) कुल 10 (दस) भाषाओं को चुना गया। इनमें सं 4 (चार) जनजातीय भाषाएँ हैं। पूर्व में बिहार सरकार, शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों में पठन-पाठन हेतु अनेकोंअधिसूचना एवं आदेश जारी किया गया। उनमें से कुछइस प्रकार हैं (पुस्तकों में छपे अभिलेख के अनुसार) :-

1.Gorenment of Bihar, Education Department Resolution No. – 645 E. R. of         Ranchi, 13th August 1953.(**अनुलग्नक -15)

2. Copy of letter No. VII/G14-C2/55E-6124 dated 20.12.1956, from Sri     N.D.J.Rao, Esqr. I.A.S. Special officer to Gorenment, Education department   to  all the Divisional Inspector of School.(अनु0-20)

3. No. VII 12-04/60-5508 Gorenment of Bihar, Education department,     Resolution. Patna, the 11 October, 1961. (**अनुलग्नक – 16).

4.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्र संख्या -850, दिनांक 05.02.1960. (**अनुलग्नक – 17)

5.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्रांक – 3242, दिनांक 28.10.1971. (**अनुलग्नक – 18).

6.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्रांक – 3415, दिनांक 07 जुलाई 1973. (**अनुलग्नक – 01).

7.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्रांक – 312, दिनांक 15.01.1974. (**अनुलग्नक – 19)

8.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, संकल्प संख्या -2/4830,

दिनांक 23.11.1974.(**अनुलग्नक – 05).

9.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्रांक – 648, दिनांक 08.04.1976. (**अनुलग्नक – 20).

10.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्र संख्या -2842,

दिनांक 23.12.1976. (**अनुलग्नक -06).

11.बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, संकल्प संख्या- 84,

दिनांक 22.01.1978. (**अनुलग्नक – 07).

उपरोक्त विभागीय पत्रों एवं पत्राचारों के संबंध में समीक्षा किये जाने पर, यह प्रश्न उठता है कि –

  1. इन प्रावधानों के रहते हुए आखिर आदिवासी भाषा का विकास अबतक क्यों नहीं हुआ ?
  1. क्या, सरकार नहीं चाहती थी कि आदिवासी समाज के बीच मातृभाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा दी जाय ?
  1. क्या, खुद आदिवासी समाज के लोग नहीं चाहते हैं कि उनके बीच मातृभाषा अथवा आदिवासी भाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा दी जाय ?

इन बातों को समझने के लिए यह जानना होगा कि शिक्षा व्यवस्था किन लोगों के हाथों में है तथा इसका प्रचार-प्रसार का तरीका कैसे है ? अबतक भारत सरकार नियम कानून में शिक्षा व्यव्स्था का संचालन सरकारी नियमों के अनुकूल मुख्य रूप से निम्न प्रकार से संचालितकिया जा रहा है – 1. सरकारी स्कूल-कॉलेज। 2. गैर सरकारी स्कूल-कॉलेज। ये गैर-सरकारी स्कूल कॉलेज या     तो प्राइवेट रूप से चल रहे हैं या धार्मिक अल्पसंख्यक या भाषायी अल्पसंख्यक के रूप में हैं। इन गैर-सरकारी स्कूलों समूह में आदिवासियों के स्कूल नहीं के बराबर है।

वर्तमान झारखण्ड सरकार ने सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा हेतु 1ली कक्षा में हिन्दी एवं अंग्रेजी विषय को आवश्यक कर रखा है। उसके बाद तीसरी भाषा विषय के रूप में मातृभाषा विषय का प्रावधान है, किन्तु आदिवासी क्षेत्रों में अबतब प्राथमिक स्तर पर जनजातीय भाषा शिक्षकों की बहाली नहीं हो पायी है। झारखण्ड सरकार में कई बार प्रयास भी हुए। 1ली कक्षा से 5वीं कक्षा तक कँड़ुख़ (उराँव), मुण्डारी, हो, एवं संताली भाषाओं में पुस्तकें भी छपी पर इन विषयों के शिक्षकों की बहाली नहीं होने पर पाठ्य पुस्तकें बेकार हो गईं। पता नही,ं सरकार इसके लिए गंभीर है भी या नहीं ! वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मरांडी के समय आदिवासी भाषा की पढ़ाई के हिसाब से एक बढ़िया सिलेबस तैयार हु था, पर पता नहीं किस सोच के तहत वर्तमान सरकार ने उसे अनदेखी कर, एक नया पाठ्यक्रम घोषित कर दिया है, जिसमें +2 स्कूलों के पाठ्यक्रम में आजादी के बाद से चली आ रही जनजातीय भाषा पढ़ाये जाने के संकल्प को पूरी तरह नकार दिया गया है। पता नहीं, आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी और आदिवासी राजनीतिज्ञ इस बारे में क्या सोच रहे हैं, वह तो समय ही बतलाएगा ?

इधर सामाजिक सहयोग से कुँड़ुख़ भाषा विषय की 9वीं एवं 10वी कक्षा हेतु पाठ्यपुस्तक छपी और जिसे शिक्षा विभाग ने मान्यता दे रखा है। पर 6वीं, 7वीं एवं 8वीं कक्षा हेतु पाठ्य पुस्तक के लिए न तो सरकारी प्रयास हो पाये हैं न ही सामाजिक प्रयास। इस स्थिति में अगर कोई प्राईवेट स्कूल अपने स्कूलों में भाषा की पढ़ाई कराना भी चाहें तो पुस्तकों के आभाव में चला नहीं पा रहे हैं।

धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूलों में से ईसाई अल्पसंख्यक स्कूलों का अपना माजरा है। वैसे ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल संचालकों का दावा है कि आदिवासी भाषा-भाषी क्षेत्रों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने में उनका बहुत बड़ा योगदान है। इस सच्चाई से, अनदेखा नहीं किया जा सकता है। पर मातृभाषा के माध्यम से प्रथमिक शिक्षा के प्रावधानों को ईसाई मिश्नरियों ने भी पूरी तरह नजर अंदाज किया है। कहने के लिए तो इन संस्थाओं के माध्यम से अनेकानेक साहित्यिक पुस्तकें छपी हैं, पर वह, दिखावे के लिए रह गई हैं। बिहार सरकार, शिक्षा विभाग, पत्रांक – 3242, दिनांक 28.10.1971 के माध्यम से यह विभागीय निर्देश दिया गया था, पर इस आदेश का पालन नहीं हो पाया। कहा जाता है कि अल्पसंख्यक स्कूलों मे प्रशासनिक व्यवस्था के नियमों को छोड़कर पाठ्यक्रम आदि में सरकारी नियमों का पालन किया जाता है। पर आदिवासी भाषा के पठन-पाठन करवाये जाने में अबतक उस संकल्प पर खरा नहीं उतर पाये। कहने को तो ईसाई आदिवासियों का दावा है कि उनके बहुत सारे स्कूल कॉलेज हैं। पर हकिकत में वे स्कूल, आदिवासी एवं आदिवासियत के विकास के लिए नहीं दिखाई पड़ते हैं।

तीसरी बड़ी सरकारी शिक्षा संचालन व्यवस्था कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार का है। पूरे झारखण्ड में लगभग 100 से अधिक आवासीय विद्यालय है। जहाँ सिर्फ आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं। इन स्कूलों में भी अबतक की जानकारी के अनुसार, मातृभाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा दिये जाने का कार्य आरंभ नहीं हो पाया है। कहने के लिए तो जनजातीय कल्याण के नाम पर अरबों रूपये खर्च हो रहे हैं, पर क्या, कल्याण के नाम पर सिर्फ छात्रवृति बांटे जाएँगे, या फिर मातृभाषा माध्यम से प्राथिमक शिक्षा देने का अलख जगाकर, आदिवासा भाषा-संस्कृति को बचाने एवं जगाने का साहसिक कार्य भी किये जाएंगे  ?

इन परिस्थितियों में हमें आंदोलनकारी छात्र एवं छात्रनेताओं की बात याद आती है, जब वे झारखण्ड बनने से पहले आपस में बातें किया करते थे – अगर कल के दिन झारखण्ड बनेगा तो सिस्टम वही रहेगा, जो बिहार में है। अर्थात मंत्री से लेकर संतरी तक और टेक्नोक्रेट से लेकर व्यूरोक्रेट तक वही पुरानी व्यवस्था ही रहेगी, तो फिर हम यह आन्दोलन किसके लिए कर रहे हैं। पढ़ा-लिखा वर्ग तो कहीं भी नौकरी या व्यापार कर लेगा। हमारे गाँव-समाज के लोगों को क्या मिलेगा, जो इस आन्दोलन में जूझ रहे हैं। आदिवासी समाज के पास अपनी भाषा है, संस्कृति है, अपना रीतिरिवाज है। अगर आन्दोलन के माध्यम से यह धरोहर बच जाता है तो हम आन्दोलन को सफल मानेंगे। इसके लिए भाषा को बचाना होगा। भाषा बचेगी तो संस्कृति भी बचेगी और भाषा तभी बचेगी जब भाषा की पढ़ाई प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक हो और आज के भूमण्डलीकरण के दौर में अपनी आदिवासी भाषा को बचाने एवं निखारने के लिए अपनी भाषा की लिपि का होना आवश्यक है। समाज की पहचान भाषा से है और भाषा की पहचान उसकी साहित्य-लिपि से है!!

लेखक :  डॉ0 नारायण भगत, विभागाध्यक्ष, कुँड़ुख़, डोरण्डा कॉलेज, राँची।

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